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मत पूछो औकात हमारी (पत्रकारों को औकात बताने वालों के लिए )

साभार @ राकेश अचल ( वरिष्ठ पत्रकार )

भाजपा के महान नेता कैलाश विजयवर्गीय अब पत्रकारों की औकात पूछने लगे हैं ।ठीक भी है उन्हें अपनी औकात के बराबर वालों से ही बातचीत करना चाहिए और इसके लिए सवाल करने वाले की औकात पूछी जाना चाहिए ।औकात का वास्तविक अर्थ हम अपने मित्र अजित से बाद में पता करेंगे ,अभी तो हम सिर्फ इतना जानते हैं कि एक पत्रकार की औकात किसी भी नेता के मुकाबले आज भी बहुत ज्यादा है ।नेता जिसे दो कौड़ी का पत्रकार कहते,समझते और मानते हैं वो किसी भी सौ कौड़ी के नेता की धूल झड़ा सकता है ।
समाज में पिछले पांच साल में पत्रकारों का सम्मान लगातार गिरा है क्योंकि देश में बनी सरकार ने पूरे मीडिया को अपना चारण-भाट बनाने का बीड़ा उठा लिया है । नयी सरकार जैसे देश को कांग्रेस मुक्त बनाना चाहती है उसी तरह मीडिया मुक्त भी बनाना चाहती है लेकिन उसका सपना पूरा नहीं हो रहा है ।मीडिया घरानों को खरीदने और भयाक्रांत करने में पूरी कामयाबी न मिलने से दुखी सरकार ही बचे-खुचे पत्रकारों की हैसियत यानि औकात पूछ रही है ।सीमित वेतन पर काम करने वाले पत्रकारों में से आज भी ऐसे पत्रकारों की कमी नहीं है जिनकी औकात कैलाश विजयवर्गीय जैसे नेताओं के मुकाबले कहीं ज्यादा है ।
सवाल केवल कैलाश विजयवर्गीय का नहीं ,सवाल किसी एक पत्रकार का भी नहीं बल्कि नेताओं और पत्रकारों की पूरी बिरादरी का है और इसलिए अब पत्रकारों की पूरी बिरादरी को [भले ही उनमने कुछ चारण और भाट किस्म के पत्रकार भी शामिल हों]ऐसे नेताओं का प्रतिकार करना चाहिए जो कैलाश विजयवर्गीय जैसी जुबान रखते हैं पत्रकारों को हर युग में ऐसी विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।जिस मध्यप्रदेश से कैलाश विजयवर्गीय आते हैं उसी मध्यप्रदेश में अपने जमाने के विद्वान मुख्यमंत्री स्वर्गीय अर्जुन सिंह ने भी पत्रकारों [तब मीडिया नहीं था]को चारण-भाट बनाने का कुप्रयास किया था ,वे कामयाब भी हुए लेकिन उन्होंने भूलकर भी किसी पत्रकार से उसकी औकात नहीं पूछी ।
समझदार नेता पहले अपने गिरेवान में झांकता है बाद में दूसरें की कॉलर पर हाथ डालता है लेकिन कैलाश विजयवर्गीय जैसे नेता भूल जाते हैं कि उनका इतिहास कोई सदी-दो सदी पुराना नहीं है।यदि दो कौड़ी के पत्रकार अपनी औकात पर आ जाएँ तो दुनिया को उनकी असली औकात से रूबरू करा सकते हैं ,लेकिन पत्रकार बदले की भावना से नेताओं की तरह न काम करते हैं और न सवाल करने से पहले किसी नेता की औकात पूछते हैं ।जो ऐसा करते हैं उनकी औकात हमेशा कैलाश जी जैसे नेताओं से कहीं ज्यादा होती है ।
आज अविश्वास के भयानक दौर में भी पीड़ित व्यक्ति पुलिस,नेता या अदालत जाने से पहले पत्रकार के पास ही जाना पसंद करता है ,क्योंकि समाज में पत्रकार के प्रति भरोसा आज भी दूसरी सस्थाओं के मुकाबले कहीं ज्यादा है ।यही विश्वास पत्रकार की औकात का पैमाना है।किसी पत्रकार ने किसी नेता के बराबर कितना कमाया ये उसकी औकात का पैमाना हो ही नहीं सकता ।कम से कम आज के युग में तो बिलकुल नहीं ।कैलाश जी के पुत्र दुर्भाग्य से आज एक अभियोगी के रूप में जेल की सलाखों के पीछे हैं ,ये घटना ही उन्हें औकात की असल परिभाषा समझने के लिए पर्याप्त है ।जिस इंदौर में कैलाश जी के शिबाम्बु के चिराग जलते रहे हैं उसी शहर में पुलिस ने उनके विधायक बेटे को हवालात की हवा खिला दी ।
इस प्रसंग में मुझे ज्यादा कुछ नहीं कहना ।पत्रकारों की अपनी गैरत है ,वे समझदार बिरादरी माने जाते हैं ,इसलिए खुद तय करेंगे कि औकात पूछने वाले नेताओं और अधिकारियों से कैसे निबटा जाये ?मुझे उम्मीद है कि रास्ता अवश्य निकलेगा ।भविष्य में दूसरे नेता कैलाश विजयवर्गीय जैसा गलत सवाल किसी पत्रकार से नहीं पूछेंगे ।वैसे भी कैलाश जी जिस शहर में पार्षद से मंत्री तक बने उसी इंदौर शहर में स्वर्गीय राजेंद्र माथुर ,राहुल बारपुते और प्रभाष जोशी तथा प्रभाकर माचवे जैसे पत्रकार पैदा हुए और उनकी हैसियत किसी भी कैलाश विजयवर्गीय से ज्यादा हमेशा आंकी गयी 

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