शिवराज जी ! बातों के बताशे से कोरोना न मार पेहो

सचिन चौधरी #बुंदेली बौछार ( 7970281421 )

ऐसी आपदा जिससे दुनिया के बड़े बड़े देश हिल गए। उसी बीमारी से हमारे पांव पाँव वाले भैया शिवराज सिंह चौहान अकेले जंग लड़ने पर आमादा हैं।
बुंदेली में एक कहावत है, बातों से बताशे नहीं बनत, ईके लाने शक्कर चाउने आउत। तात्पर्य यह है कि सिर्फ बातों से बताशे नहीं बनाये जा सकते उसके लिए शक्कर की जरूरत पड़ती है। लेकिन मध्य प्रदेश में शायद बातों के बताशे से कोरोना ख़त्म करने की कोशिश हो रही है। हमारे सुपरमैन, सुपरहीरो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अकेले ही जंग के मैदान में डटे हुए हैं। ऐसी आपदा जिससे दुनिया के बड़े बड़े देश हिल गए। हिन्दुस्तान जैसी विशाल आबादी वाले देश को एहतियातन लॉक डाउन करना पड़ा, उसी बीमारी से हमारे पांव पाँव वाले भैया शिवराज सिंह चौहान अकेले जंग लड़ने पर आमादा हैं। अनूठा हाल है मध्य प्रदेश का। कांग्रेस की सरकार गिराने के बाद भाजपा सरकार बनी। शिवराज सिंह चौहान अनुभव के खजाने के साथ फिर से मुख्यमंत्री बने। इसी बीच कोरोना ने देश प्रदेश में एंट्री ली। इसके बाद से ऐसा लग रहा है कि सोशल डिस्टेंसिंग और लॉक डाउन जैसे शब्द सिर्फ मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण के लिए अमल में लाये जा रहे हैं।

फिल्म ‘शोले’ का वह डायलॉग याद आता है। अंग्रेजों के ज़माने के जेलर असरानी कहते हैं, आधे इधर जाओ, आधे उधर जाओ, बाकी मेरे पीछे आओ। लेकिन मध्य प्रदेश में न तो आधे इधर जा सकते हैं, न आधे उधर। क्यूंकि यहां शिवराज अकेले ही हैं। वे अकेले क्यों हैं ये तो मुख्यमंत्री ही खुद बेहतर बता सकते हैं। लेकिन उनका अकेला होना प्रदेश को भारी पड़ रहा है। ऐसी भयंकर स्वास्थ्य आपदा में प्रदेश में स्वास्थ्य मंत्री नहीं है। हर जगह सीमायें सील हैं लेकिन गृह मंत्री नहीं। घर घर जाकर गरीबों को अनाज देना है लेकिन खाद्य मंत्री नहीं। हालांकि कथित कुतर्कशास्त्रियों का तर्क यह है कि सरकारें तो अधिकारी चलाते हैं, मंत्रिमंडल नहीं बना तो क्या हुआ। तो पहला जवाब तो यही है कि यदि इतनी भयंकर आपदा के समय में भी एक ही व्यक्ति सरकार चला सकता है तो फिर सामान्य परिस्थितियों में तो मंत्रिमंडल की जरूरत ही नहीं।

दूसरा और महत्वपूर्ण जवाब यह है कि अगर अधिकारी ही सब कुछ सही से चला लेते होते तो प्रदेश के 4 आईएएस और राजधानी भोपाल में स्वास्थ्य विभाग के 70 से ज्यादा कोरोना संक्रमित लोग न होते। खुद को कर्तव्यनिष्ठ बताने के चक्कर में स्वास्थ्य विभाग के बड़े अधिकारियों ने अपने ही अमले की जिंदगी दांव पर लगा दी। जिस प्रदेश में स्वास्थ्य महकमा, पुलिस महकमा खुद एक एक करके वायरस का शिकार होने लगे उस प्रदेश में प्रशासनिक हालत अगर और बिगड़ी तो यह कल्पना करके भी डर जायेंगे आप।

इसी प्रशासन ने इंदौर से कैदियों को जबलपुर और सतना भेजने का बेतुका निर्णय लिया और सतना, रीवा जैसे जिले जो संक्रमण से बचे हुए थे वहां भी ऐसा लग रहा कि सरकारी कोरोना भेजा गया है। भोपाल शहर में चार लोगों की मौत के बाद पता चल पाता है कि उन्हें कोरोना संक्रमण था। इनमे से ही एक व्यक्ति को तो कई अस्पतालों में भटकाए जाने के भी आरोप हैं।

रही बात व्यवस्थाओं की, तो लॉक डाउन के 21 दिन बाद भी राजधानी भोपाल में सब्जी, दूध और राशन की पूर्ण सप्लाई का दावा नहीं किया जा सकता तो बाकी प्रदेश का तो भगवान ही मालिक है। सामाजिक संगठनों द्वारा भोजन वितरण रोकने के बाद प्रशासन हर गरीब तक भोजन पहुंचाने में कामयाब हो पाया हो, यह दावा भले अफसरान कर दें लेकिन सच्चाई, भूखे पेटों से आवाज दे रही है।

यह सब जानते हैं कि कोरोना लाइलाज है। लम्बे समय का लॉक डाउन इसके संक्रमण की चेन तोड़ने और जांच के लिए जरूरी व्यवस्थाएं जुटाने भर में समय देने के लिए मददगार हो सकता है। लेकिन लोगों को घरों में बिना राशन पानी के कैद करने का नाम लॉक डाउन नहीं है,बीते 21 दिनों में मध्य प्रदेश कोरोना संक्रमित मरीजों की सूची में देश में पांचवें नंबर पर आ चुका है जबकि प्रदेश में अब तक 45 मौत हो चुकी हैं। वहीँ कोरोना की जांच क्षमता में हमारा नंबर नीचे से लिस्ट में हैं। ऐसे में युद्ध विराम के भरोसे युद्ध जीतने की रणनीति में मध्य प्रदेश का बिना सेना वाला सेनापति कितना कामयाब होगा, समझना मुश्किल है।

अब एक और महत्वपूर्ण बात

कोरोना सिर्फ लोगों के स्वास्थ्य और जान का संकट भर नहीं है बल्कि पूरे देश प्रदेश की आर्थिक गतिविधियों, सामाजिक विकास सब कुछ ठप होने की आशंका को अपने साथ लाया है। ऐसे में प्रदेश में सामने भविष्य की तैयारियों का भी बड़ा संकट है। प्रदेश में टैक्स कलेक्शन के सबसे बड़े स्रोत हैं शराब और पेट्रोल की बिक्री। शराब की बिक्री बंद है,पेट्रोल की न के बराबर चल रही है। केंद्रीय करों में हिस्सेदारी का भी हाल बेहाल होना तय है। ऐसे में जब तक लॉक डाउन रहता है तब तक जनता को कैसे सहयोग करते हुए आगे बढ़ा जाये और लॉक डाउन को, टुकड़ों में खोलते हुए कैसे प्रदेश की आर्थिक गतिविधियों का पहिया फिर से घुमाया जाए, यह बड़ा सवाल है। लेकिन जिन अधिकारियों की नासमझी अभी प्रदेश पर भारी पड़ रही है यदि वही भविष्य का खाका खींचेगे तो भगवान ही मालिक है। फिर चाहे अंधियारा करिए, घंटी बजाइये या फिर दीपक जलाइए कुछ होना नहीं है।

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