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देश के छोटे व्यापारी की चिट्ठी , देश और सरकार के नाम

सचिन चौधरी ##बुंदेली बौछार 7970281421

नमस्ते सरकार

सरकार बोले तो सरकार
न भाजपा की न कांग्रेस की। पक्ष की न विपक्ष की। न देश द्रोहियों की और न राष्टवादियों की। सरकार यानि हमारी सरकार। सरकार यानि गणतंत्र के गण की सरकार।
अपनी बात को शुरू करने के पहले सरकार की खुली खुली व्याख्या करने का उद्देश्य यह है कि कहीं मैं सच बोलने में देशद्रोही न बन जाऊं। या फिर कहीं भक्त तो कहीं चमचों की श्रेणी में विभाजित न हो जाऊं। आज एक मन की बात बहरी, अंधी या यूं कहिये कि कुम्भकर्णी नींद में सोती सरकारों के लिए कहनी जरूरी है। और हां बात कड़वी जरूरी इसलिए , क्यूंकि हर बार हम मध्यमवर्गीय लोगों को हमारी सरकारें कड़वी दवाई ही देती आई हैं।
सो मित्रो
मैं हिन्दुस्तान का एक मध्यम वर्गीय व्यापारी। जो ईमानदारी से अपना व्यापार चलाता हूं। एक ऐसी कौम का प्रतिनिधि हूं , जिसकी कोई धर्म नहीं बल्कि रोज कुंआ खोदकर रोज पानी पीना ही इबादत और प्रार्थना है। कहीं फ्रिज , टी वी बेचता हूं तो कहीं छोटे छोटे मकान बनाने या उनके रॉ मटेरियल बेचने का धंधा करता हूं। कहीं छोटा सा मेरा रेस्टोरेंट है तो कहीं दिन कि 2- 3 हजार रुपए बिक्री वाली साड़ी या चप्पल की दुकान।
हिंदुस्तान का वह हिस्सा जो देश के अर्थ तंत्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होकर भी सबसे ज्यादा शोषित है। समाज से भी और सरकार से भी। नेता जी को चंदा भी देता है। नेता जी के कहने पर बाजार बंद का भी समर्थन कर देता है। बंद में बवाल हो तो नेता जी एसी में होते हैं और मेरी दुकान में आग लगी होती है। लोग फर्जी डिग्रियों पर बड़े बड़े ओहदे पा जाते हैं लेकिन मेरी दुकान के रजिस्ट्रेशन , या किसी बिल में थोड़ी सी भी कमी हो तो चार गुना जुर्माना भरना पड़ता है।
बड़े लोग बैंकों का हजारों करोड़ लेकर एयरपोर्ट से फरार हो जाते हैं। किसानों के लिए सूखा राहत के नाम पर पैकेज जारी होते हैं। गरीबों को मुफ्त इलाज, अनाज के भी दावे हैं। लेकिन छोटा व्यापारी ? सिर्फ जीएसटी के रजिस्ट्रेशन भर के लिए ही सरकार की गिनती में है ?
आज से नहीं बल्कि आजादी के बाद ये दर्द व्यापारी झेलता आया। लेकिन आज तो हद हो गई। इसलिए अपनी बात कहने पर मजबूर होना पड़ा।
पूरा देश लॉक डाउन है। सब कुछ ठप्प पड़ा है। रोज कमाने खाने वाला व्यापारी पूरी तरह निठल्ला होकर घर में लूडो खेल रहा है। सुबह शाम दुकान की याद आती भी है तो खुद को समझा लेता है। लेकिन एक महीने में अब खुद को समझाना मुश्किल हो चला है।
लॉक डाउन के बाद देश प्रदेश की सरकारों ने गरीबों को अनाज – और नकद की व्यवस्थाएं की हैं। कम ज्यादा जो भी हो लेकिन काम शुरू हुआ है। लॉक डाउन के दौरान ठप हुए उद्योगों को रियायत भी मिलना लगभग तय है। सरकारी सेवक अपनी तनख्वाह घर बैठे पा ही रहे हैं। लेकिन व्यापारी को क्या मिला इसकी सूची आपको देते हैं।

उसे अपनी दुकान का किराया देना ही है
उसे अपने स्टाफ की सैलरी देनी ही है
बिजली का मिनिमम बिल देना ही है
उसे बैंक लोन की किश्त देनी ही है ( बैंक जो किश्त अभी नहीं ले रहे , उनके मुताबिक बाद में भरने पर ज्यादा ब्याज लगेगा )
उसे दुकान के रूटीन टैक्स देने ही है
उसे जीएसटी- इनकम टैक्स आज नहीं तो कल भरना ही है
जो सामान इतने समय में गारंटी/ वारंटी/एक्सपायरी की तारीख पार कर जायेगा , वह राम भरोसे
इन सबके साथ ही किसी भी सामान को 2 रुपये मंहगा बेचे तो, 25 हजार की पूँजी वाली दुकान को सीज करके प्रशासन 25 फोटो प्रकाशित कराएगा ( भले लॉक डाउन के चक्कर में माल ही 2 रुपये मंहगा हो चुका हो )

इन सब हालातों के बाद हमारी सरकार ने एक रुपया भी किसी प्रकार की राहत मध्यम या निम्न मध्यम वर्गीय व्यापारी के लिए घोषित नहीं की है। लेकिन घावों पर नमक नहीं बल्कि मिर्ची झोंकने वाला एक बड़ा काम जरूर किया है। सरकार ने आगामी 20 अप्रैल के बाद लॉक डाउन में जरूरी सेवाओं को छोड़कर बाजार बंद रखने के आदेश तो दिए लेकिन ऑनलाइन बाजार शुरू करने के निर्देश दे दिए हैं। यानि लोग यह सोच रहे थे कि जो सामान उन्हें आज खरीदना है वह बाजार खुलने के बाद खरीद लेंगे सो उनको लॉक डाउन में ही घर बैठे सामान मिल जायेगा। ऐसे में जब कभी भी लॉक डाउन के बाद बाजार खुलेंगे तब व्यापारी के पास मक्खी मारने के अलावा शायद ही कोई विकल्प बचे।

क्या आप जानते हैं कि कि कपड़ों की दुकान में शादियों के सीजन के लिए कितना- कितना माल पड़ा है ? क्या आपको पता है कि गर्मी के सीजन में देश के लाखों व्यापारी कर्ज पर पैसा लेकर कूलर – फ्रिज का स्टॉक करते हैं ,,, जब तक यह लॉक डाउन खुलेगा सीजन जा चुका होगा और जिनको खरीदना होगा वे हमारी सरकार के प्रिय ऑनलाइन बाजार से ले चुके होंगे। ऐसे में व्यापारी क्या करेगा इसकी कल्पना कीजिये।

अब बात कोरोना संक्रमण की। क्या कोरोना सिर्फ देश के छोटे व्यापारियों से ही फैलता है ? क्या ऑनलाइन कंपनियों का माल जो कई शहरों , कई लोगों के हाथ से गुजरता हुआ वह कोरोना का वाहक नहीं हो सकता ? यदि वह सुरक्षित है तो स्थानीय व्यापारी द्वारा , अपने मोहल्ले पड़ोस के लोगों को सामान देने में क्या समस्या है।
यदि सरकार ऑनलाइन कंपनियों को अलग अलग शहरों से सामान के परिवहन की छूट दे रही है तो क्या स्थानीय व्यापारियों को दुकान बंद रखते हुए , सुरक्षा नियमों का पालन करते हुए , घर तक सामान पहुंचाने की छूट नहीं मिलनी चाहिए

ये मैं जनता हूं , कि व्यापारी जो चाहता है वह उसे कभी नहीं मिलता। फिर भी मुद्दा उठाना जरूरी है , क्यूंकि व्यापारियों के नाम पर ही दुकानदारी करने वालों से ज्यादा उम्मीद बची नहीं है।

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