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बुन्देली स्वाद : जे बुंदेली व्यंजन बनाओ,खाओ, तो मुंह में आये पानी (पूरी विधि )

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बुन्देली स्वाद

पूर्ति वैभव खरे

 

हमारे हिन्दुस्तान में हर चीज में विभिन्नताएं पाई जाती हैं, फिर चाहे वो परिधनों की बात हो,रीति-रिवाजों की बात हो या की भारत के जायके की।
आपको देश के हर कोने में एक अलग ही जायका मिलेगा।जिसे आप हमेशा याद रखेंगें, और कई बार आप उसका लुत्फ उठाना चाहेगें। तो आइये आपको लिये चलती हूँ एक ऐसे विशेष जायके से भरे स्थान पर जहाँ का स्वाद आप चटकारे ले लेकर कई दफा खाना चाहेगें-
वो क्षेत्र है बुंदेलखंड जी हाँ! ये वही बुंदेलखंड है जहां के खुजराहो के मन्दिर,आल्हा-ऊदल के किस्से,चन्देलों की गौरव गाथा विश्व प्रसिद्ध है।
तो शुरू करते हैं, बुन्देली स्वाद की सबसे पहले बात करते है एक विशेष व्यंजन की जो लगभग अब हर जगह अपनी पैठ बना चुका है लेकिन आज भी बुन्देली महिलाओं के हाथ इस विशेष प्रकार के व्यंजन में सधे हुए हैं, इसका नाम है – कढ़ी।
कढ़ी- ये बेसन और मठ्ठे से बनाई जाती है, बेसन कम मात्रा में और मठ्ठा अधिक मात्रा में इसको बनाने में लगभग एक घण्टे का समय लगता है, धीमे आँच पर देर तक पकाये जाने के बाद इसमें बेसन से बने पकौड़े डाले जाते है और अंततः लाल मिर्च और हींग का तड़का जिसे बुंदेली भाषा में ‘बघार’ कहते हैं दिया जाता है ।
और बुंदेली लोग इसे अधिक मात्रा में बनाते हैं क्योंकि इसकी खुशबू बहुत तेज होती है जोकि पड़ोसी के घर जरूर जाती है तो ऐसे में एक-एक कटोरी कढ़ी पड़ोसियों के लिये रखना जरूरी हो जाता है।
कुछ आपको मठ्ठे के बारे में भी बताती चलूँ , मठ्ठा ,दही में बहुत सारा पानी डालकर बनाया जाता है, ये पुराने समय से चली आ रही ‘घी’ बनाने के तरीके से ही निकला है, अधिक मथने के कारण निकला ये तरल पदार्थ ‘मथा’ कहा गया जो बाद में चलकर अपभ्रंश शब्द मठ्ठा में बदल गया।
यूँ तो कई जगह आपको कढ़ी खाने मिलेगी लेकिन बुन्देली कढ़ी का मजा ही कुछ और है, ये व्यंजन आपको हर शुभ अवसर पर बनते मिल जायेगा यहाँ पर।

बरा- प्रोटीन से भरपूर, तेल रहित एक खास व्यंजन।
रात भर उड़द की दाल को भिगोने के बाद उसको सिलबट्टे से पीसकर (सिलबट्टा इसलिये क्योंकि ये मिक्सी में गीली हुई या ज्यादा महीन दाल से नहीं बनाये जा सकते) फिर हींग मिलाकर अच्छे से बड़ी सी परात में फेंटकर ,एक चकोले पर गिला कपड़ा डालकर, गोलाकार देकर, धीमें आँच की कढ़ाही में डालकर,देर तक सेंक देकर, नमक के पानी में डाल दिये जाते है जिससे इसका सारा तेल निकलकर बाहर आ जाता है और ये बेहद मुलायम हो जाते हैं।
इसे विशेष प्रकार के मठ्ठे(रव) में डाल के खाया जाता है जिसमें भूनी और पिसी हुई राई,जीरा,मैथी और हींग के तड़के का प्रयोग किया जाता है।
बुन्देली लोग इसे लगभग हर विशेष पर्व में बनाते हैं। शादियों में इनका होना उतना ही अनिवार्य है जितना शायद दूल्हा-दुल्हन का।

मगोड़ी- ये भी प्रोटीन से भरपूर होती हैं, मूंग की दाल को रात भर भिगोकर रखा जाता है और फिर पीसकर हींग,हरी प्याज,अदरक,हरी मिर्ची, आदि डालकर अंगुलियों के आगे भाग के सहारे कढ़ाही डालकर धीमे आँच में सेंककर गर्मा-गर्म परोसे जाते हैं, इन्हें ज्यादतर टमाटर की चटनी के साथ खाया ज्यादा है।
बुन्देलखण्ड में ऐसी मान्यता है कि अगर मगोड़ी बनाकर मेहमान का स्वागत करो तो मेहमान खुश हो जाता है।ये भी पड़ोसियों को ध्यान में रखकर बनाना अनिवार्य है।
ठड़ूला- अधिकतर सर्दी के दिनों में पसन्द किया जाने वाला लोकप्रिय बुन्देली व्यंजन,जिसमें उड़द की दाल का,चावल का और गेंहूँ का आटा, हींग,लहसुन,अदरक (सभी गर्म तासीर वाले मसाले) आदि डालकर गूँथा जाता है, फिर इन्हें पूड़ियों की तरह कढ़ाही से तलकर, कई तरह की सब्जियों व चटनी के साथ खाया जाता है।
ये सर्दी को दूर करने में कारगर सिद्ध होता व्यंजन है।

चलिए अब आपका परिचय करते हैं डलिया,चुलिया से ,अरे! नहीं ये कोई व्यंजन नहीं ये तो बुन्देली परम्परा है जो सदियों से यहाँ पर चली आ रही।
हाँ! ये जरूर है कि इन डलिया और चुलिया का सम्बंध बुन्देली पकवानों से अवश्य है। जब कोई लड़की ब्याही जाती है, या संतान प्रप्ति होती है कोई भी शुभ काम इन चुलिया, डलिया(टीपरिया बुन्देली भाषा में) के बिना संभव नहीं।
इसमें जो व्यंजन बनते हैं वो बुन्देली महिलाओं की अद्भुत कलाकारी को प्रदर्शित करते हैं, इन पकवानों को बनाना बेहद कठिन है, इन्हें अधिकतर बहुत सारी स्त्रियाँ मिलकर बनाती हैं,ये पकवान बुन्देली नारियों की एकता का भी प्रतीक हैं इनको अकेले नहीं बनाया जा सकता, जब भी किसी के घर में कोई शुभ-कार्य होता है तो जुट पड़ती हैं सभी आस-पड़ोस की औरतें और तरह-तरह की आकर्षक, कलाकारी से भरपूर पकवान तैयार करतीं हैं- जिसमे,गुझिया,पपड़ी,अमान-समान,गुन्ना,पान,फूल,आस,पुआ आदि विशेष हैं।
आल्सुवाइ- ये गर्भवती स्त्री के गोद- भराई में बनाये जाने वाला एक कलात्मक मीठा पकवान है, जिसमे तरह-तरह की नक्काशी मंगल- कामनाओं के स्वरूप की जाती है। ये घी, शक्कर,मैदा से तैयार कर सूखे मेवे,सिक्कों औऱ दूब से सजाई जाती है।
इन सभी पकवान को अगर आप हाथ में लेंगें तो आप खाने से ज्यादा इन्हें घर में सजाना चाहेगें, इनको बनाने में नाखूनों का, अंगुलियों का,कलाईयों का प्रयोग किया जाता है,इनको बनाने में विशेष प्रशिक्षण के आवश्यकता होती है। तभी ज्यादातर इनको बनाने में घर की बुजुर्ग महिलाओं की मदत ली जाती है ।
इनको बनाते समय विशेष प्रकार के बुन्देली लोकगीत गाये जाते हैं। यहाँ की लोगों का इन सभी छोटी-छोटी बातों के साथ विशेष जुड़ाव है। ये महज बुन्देली जायका नहीं ये एक परम्परा है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही। और चलती रहेगी। तो जब भी बुन्देलखण्ड पधारे तब बुन्देली जायका जरूर लें।।

–पूर्ति वैभव खरे–

 

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