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ललितपुरः शेक्सपियर के नाटकों के पात्र आज भी हमें हँसाते, रुलाते और धीरज बंधाते हैं

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456 वीं जयन्ती पर विशेष
ललितपुर। महान साहित्यकार विलियम शेक्सपियर की जयन्ती पर आयोजित परिचर्चा को संबोधित करते हुए नेहरू महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य प्रो. भगवत नारायण शर्मा ने कहा कि भारत शब्द को ब्रह्म मानता है, परन्तु शब्द भूगोल को नही मानता। इसलिए देशकाल की सीमाओं को तोड़ कर शब्द ब्रह्म की व्यापकता को सार्थक करते हुए चतुर्दिक हवा की तरह फैल जाते है। व्यास, बाल्मीकि, कालिदास, तुलसी, शेक्सपियर, गालिब के कालजयी साहित्य दर्पण में पूरे जनजीवन का प्रतिबिंबित होने वाला चित्र हम सब की अनमोल थाती है। जब भी कोई किसी इंग्लैंड वासी से सवाल करता है कि यदि चारों ओर जल प्रलय होने लग जाये तो सबसे पहले क्या बचाना चाहोगे? तो उनका एक ही उत्तर था शेक्सपियर का साहित्य। अपने देश में भी ब्रिटिश सरकार एग्रीमेन्ट के आधार पर विदेश जाने वाले मजदूरों को ब्रिटिश गयाना या ट्रिनीडाड टुबेगो जैसे उपनिवेशों में भेजती थी उन अभागों के हाथों में संपत्ति के नाम पर यद्यपि कोरा श्रम ही था, तथा वे स्वदेश से अपने साथ तुलसीदास की मात्र 40 दोहों वाली पोथी हनुमान चालीसा को जरूर साथ में संकटमोचन के रूप में रखते थे। विश्व के ऐसे दो महान साहित्य स्रृष्टा तुलसी और शेक्सपियर समकालीन हैं। मंचों से प्रस्तुत होने वाली रामलीलाओं में तुलसी के संवाद वैसे ही गाये जाते हैं जैसे 456 वर्षाे से थियेटरों में प्रस्तुत शेक्सपियर के डायलॉग। शेक्सपियर के सुखांत नाटकों में प्रेम की तीव्र अनुमति एवं प्रफुल्लित जीवन का हर्षाेल्लास भरा है, तथा दुखांत नाटकों में नायक के पतन के पीछे उसकी चारित्रिक दुर्बलता परिलक्षित होती है। आन्तरिक अन्तर्द्वन्द प्रायरू व्यक्ति की निर्णय क्षमता को कुंठित कर देते हैं। शेक्सपियर की प्रमुख कृति ओथेलो में खलनायक इयागो का चरित्र बेहद सबल है। इस कृति में मानव जीवन की उन गहराईयों का चित्रण है जो अपना अमिट प्रभाव छोड़ती है। शेक्सपियर के सभी किरदार अच्छाई और बुराई से लैस हैं। वे ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें हम अपने आसपास हर समय देख सकते हैं। अपने नाटकों के माध्यम से शेक्सपियर एक इंसान के मन की व्यथा को बड़ी सरलता से लोगों के सामने हुबहू रख देते हैं। शेक्सपियर के लिए विवेकसंगत मार्ग, जीवन के विभिन्न लक्ष्यों को एक साथ लेकर चलना और एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकसित करना है। इन आदर्शों को वह हमारे मन पर अपनी काव्य प्रतिभा, शक्तिशाली कल्पना एवं मानवप्रधान असाधारण जानकारी से और सूक्ष्म भावनाओं के कोमलकांत वर्णन द्वारा चित्रित कर देते हैं। उनकी महान कृति टेम्पेस्ट में पात्रा मिरांडा के ये शब्द धरती के एक-एक मनुष्य को भरोसा दिलाते हैं कि संसार छोड़ असमय में भागो नहीं और इस चमत्कार को अपनी आँखें खोल देखो कि यहां कितने अच्छे और सच्चे नेक इंसानों की बहुतायत है। वस्तुतरू इस साहसी दुनिया को और बेहतर से भी बेहतर बनाने में अपनी शारीरिक और मानसिक शक्तियों का संघर्षपूर्ण उत्तमोत्तम उपयोग करो।

केतन दुबे- ब्यूरो रिपोर्ट
📞9889199324

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