Home Hindi ललितपुरः भारतीय साहित्य से श्रेष्ठ साहित्य देखने को नहीं मिलता: डा.पाण्डेय

ललितपुरः भारतीय साहित्य से श्रेष्ठ साहित्य देखने को नहीं मिलता: डा.पाण्डेय

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साहित्य ही कराता है सही गलत का ज्ञान रू डा. शास्त्री
नेमवि में साहित्यकारों का हुआ सारस्वत सम्मान
ललितपुर। संस्कृत भवन सभागार नेमवि में अखिल भारतीय साहित्य साहित्य परिषद के तत्वाधान में साहित्यिक परिचर्चा एवं सारस्वत सम्मान समारोह सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर साहित्य परिषद द्वारा प्रकाशित श्श्साहित्य धर्म एवं इतिहास्य्य तथा पूर्व जिला संघ चालक रूपसिंह द्वारा लिखित श्श्मेरा गद्य प्रवाह एवं कीर्ति शौर्य गाथा्य्य का विमोचन मुख्य अतिथि भारतीय साहित्य परिषद उत्तर प्रदेश के प्रांत महामंत्री डा.महेश पाण्डेय बजरंग एवं सम्मान समारोह के अध्यक्ष डा.ओमप्रकाश शास्त्री, विशिष्ट अतिथि प्राचार्य डा.अवधेश अग्रवाल द्वारा किया गया।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि डा.महेश पाण्डेय बजरंग ने कहा कि काव्य साहित्य में लोक मंगल की भावना है जबकि यूरोपीय साहित्य में लोकरंजन दिखता है। बैद्धिक साहित्य परम्परा में लोक मंगल का अधिष्ठान है और हमारा प्रेम देश के साथ चलता है। भारतीय साहित्य ने समाज का निरंतर मार्गदर्शन किया है। विश्व में कहीं भी भारतीय साहित्य से श्रेष्ठ साहित्य देखने को नहीं मिलता है। अध्यक्षता करते हुए डॉ. ओमप्रकाश शास्त्री ने भारतीय और वैदैशिक साहित्य की मीमांसा करते हुए करते हुए कहा कि भारतीय साहित्य नैतिक मूल्यों, धर्म संस्कृति, संस्कार एवं अध्यात्म का प्रतिपादन करता है। उन्होंने कहा कि वेदों में जो लिखा है वह भारतीय साहित्य का प्रतिबिम्ब है। साहित्य के माध्यम से ही हमें सही और गलत का ज्ञान होता है। सहित्य का क्षेत्र अनन्त होता है। प्रत्येक राष्ट्र का साहित्य अपने देश की सामाजिक, भौतिक, अध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्यों की व्याख्या करता है। साहित्य से ही राष्ट्र के मूल चरित्र का ज्ञान होता है। विशिष्ट अतिथि नेमवि के प्राचार्य डा.अवधेश अग्रवाल ने कहा कि युवा पीढ़ी के लिए भारतीय साहित्य का ज्ञान कराना अत्यावश्यक है, क्योंकि साहित्य से ही उन्हें भारतीय महर्षियों, पूर्वजों के महनीय संस्कारों, त्याग, तपस्या एवं ज्ञान की जानकारी प्राप्त होती है। संस्कृत भारती के मंत्री डा.जगदीश प्रसाद शर्मा ने कहा कि भारत देश का गौरवशाली साहित्य लाखों वर्ष प्राचीन है। प्राचीनतम गं्रथ ऋग्वेद से प्रारम्भ हुई साहित्य की परम्परा श्रीमद् भगवतगीता से प्रवाहित होती हुई रामचरित मानस तक समाज को प्रेरणा देती है। उपाध्यक्ष डा.जनक किशोरी शर्मा ने कहा कि हमारे देश की नारियों को साहित्य का अध्ययन मनन चिंतन अवश्य करना चाहिए। जिससे भावी संन्तति में यह ज्ञान प्रवाहित हो सके। जिला शासकीय अधिवक्ता राजेश दुबे एड.ने कहा कि साहित्य की समृद्धि में बुन्देलखण्ड के विद्वानों, कवियों एवं साहित्यकारों का श्रेष्ठतम योगदान रहा है। महर्षि वेदव्यास, संत तुलसीदास, केशवदास, वृंदावनलाल वर्मा, मैथलीशरण गुप्त आदि का साहित्य युगो-युगों तक समाज का मार्गदर्शन करेगा। संगोष्ठी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग प्रचार प्रमुख मनोज तिवारी, जिला धर्म जागरण प्रमुख विनोद शर्मा, जिला बौद्धिक प्रमुख डा.हृदयनारायण उपाध्याय, कवि एवं साहित्यकार रामसेवक पाठक, पं.बाबूलाल द्विवेदी, विद्यार्थी परिषद के जिला प्रमुख डा. दीपक पाठक, हिन्दी प्रवक्ता रमेश चंद्र तिवारी, कवि राजेंद्र दीक्षित ने सम्बोधित करते हुए भारतीय साहित्य परम्परा को विश्व का सर्वश्रेष्ठ साहित्य बताया। इस मौके पर साहित्य के क्षेत्र में योगदान करने वाले डा.महेश पांडे बजरंग, पूर्व जिला संघ चालक रूपसिंह, राष्ट्रपति पुरूस्कृत रूपनारायण निरंजन, भीम सिंह यादव आदि विद्वानों एवं साहित्यकारों को सारस्वत सम्मान देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर पूर्व प्रधानाचार्य डी.पी.वर्मा, डा.अनिल सूर्यवंशी, डा.प्रीति पाठक, डा.रामकुमार रिछारिया, डा.सुधाकर उपाध्याय, डा.सुभाष जैन, जयशंकर प्रसाद द्विवेदी, कर्णप्रताप सिंह, डा.जगवीर सिंह, डा.गीरेन्द्र सिंह, डा.अमित सोनी, संदीप श्रीवास्तव, फहीम बख्श, रामसिंह राजपूत, प्रीतम सिंह राजपूत, राजेन्द्र त्रिपाठी, सजन कुमार शर्मा आदि प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। संचालन महामंत्री डा.सुधाकर उपाध्याय ने किया एवं डा.दीपक पाठक ने सभी का आभार जताया।

केतन दुबे- ब्यूरो रिपोर्ट
📞9889199324

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