Home Hindi ललितपुरः जयन्ती पे महाराणा प्रताप को करे याद

ललितपुरः जयन्ती पे महाराणा प्रताप को करे याद

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अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा ने वर्चुअल किया आयोजन
ललितपुर। मेवाड़ राज्य के महाराजा महाराणा प्रताप की जयन्ती अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के तत्वाधान में सादगी पूर्वक मनायी गयी। वर्चुअल तरीके से संपन्न हुये कार्यक्रम में वक्ताओं ने अपने-अपने विचारों को रखते हुये महाराणा प्रताप की साहसिक व वीर गाथाओं का वर्णन किया। इस दौरान महासभा के संरक्षक दरयाव सिंह परमार, प्रताप सिंह गौर, सोबरन सिंह बुन्देला, अरविन्द सिंह बुन्देला, कृपाल सिंह दद्दा, शैलेन्द्र सिंह बुन्देला, साहवेन्द्र सिंह गहरवार ने अपने विचारों को रखते हुये महाराणा प्रताप के जीवन्त गाथाओं का बखान किया। इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि महाराणा प्रताप सिंह का नाम कुँवर प्रताप जी था। इनका 9 मई 1540 को राजस्थान के कुम्भलगढ़ में हुआ था। इनकी माताजी का नाम राणी जीवत कंवरजी था। सूर्यवंश के राजा महाराणा प्रताप ने वर्ष 1568 से 1597 तक मेवाड़ राज्य पर शासन किया। बताया जाता है कि महाराणा प्रताप एक ही झटके में घोड़े समेत दुश्मन सैनिक को काट डालते थे। जब इब्राहिम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थे तब उन्होने अपनी माँ से पूछा कि हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर आए, तब माँ का जवाब मिला। उस महान देश की वीर भूमि हल्दी घाटी से एक मु-ी धूल लेकर आना जहां का राजा अपनी प्रजा के प्रति इतना वफादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना लेकिन बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था। बुक ऑफ प्रेसिडेंट यु एस ए किताब में आप यह बात पढ़ सकते हैं। महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलोग्राम था और कवच का वजन भी 80 किलोग्राम ही था। कवच, भाला, ढाल,और हाथ में तलवार का वजन मिलाएं तो कुल वजन 207 किलो था। आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं। अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है तो आधा हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे पर बादशाहत अकबर की ही रहेगी। लेकिन महाराणा प्रताप ने किसी की भी अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया। हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और अकबर की ओर से 85,000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए। महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना हुआ है जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है। महाराणा प्रताप ने जब महलों का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगों ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा कि फौज के लिए तलवारें बनाईं। इसी समाज को आज गुजरात मध्य प्रदेश और राजस्थान में गाढिय़ा लोहार कहा जाता है। हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में तलवारें पाई गई। आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 में हल्दी घाटी में मिला था। इस दौरान वर्चुअल जयन्ती कार्यक्रम में जिलाध्यक्ष भगत राजा बुन्देला अंधियारी, महामंत्री अभिषेक बुन्देला, धीरेन्द्र सिंह, वीर सिंह, बब्बू राजा, नरेन्द्र सिंह, आजाद सिंह, चाली राजा, नारायण सिंह सेंगर, रणवीर सिंह, शैलेन्द्र परमार, कल्लू राजा, बृजेन्द्र सिंह, मोहन सिंह, नाहर सिंह, लाखन सिंह, विजय राजा, इन्द्रभान सिंह, विक्रम सिंह राठौड़ आदि शामिल रहे।

केतन दुबे- ब्यूरो रिपोर्ट
📞9889199324

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