Home Hindi ललितपुरः कभी जिन्दगी में रंग घोल देता था पलाश फूल

ललितपुरः कभी जिन्दगी में रंग घोल देता था पलाश फूल

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चाय की चकल्लस ने खत्म हो रहे हैं पलाश के फूलों पर की परिचर्चा
ललितपुर। पलाश के फूल, सुर्ख फूल पलाश के, जब खिलते हैं तो फिजा सिंदूरी हो जाती है। पेड़ की शाख दहकने लगती हैं और पेड़ के नीचे जमीन पर बिखरे पलाश के फूल माहौल को रूमानी कर देते हैं। वरिष्ठ पत्रकार सुधाकर तिवारी बताते है कि बसंत पंचमी के बाद फागुन आते ही एक बार फिर से जिले में टेसू के रंग की चर्चाएं होनी लगी है। बुंदेलखंड क्षेत्र में होली में फाग व टेसू का रंग प्रसिद्ध था। लोग होली के कई दिन पहले से टेसू के फूल बीन कर उन्हें पानी में भगोकर रखते थे। जिन्हें एक-दो दिन बाद उबाल कर ठंडा हो जाने पर उसमें चूना मिला देते थे। इसके बाद सुंदर बसंती रंग उतर आता था। हल्की सी मादक सुंगध के साथ जो धानिक वर्ग बागों में या खेतों के किनारे टेसू के फूल बनने में हीनता का अनुभव करते थे। वह बाजार में ग्रामीणों द्वारा बैलगाडिय़ों में रख कर बिक्री करने के लिए लाने वाले से खरीद कर रंग उतारते थे लेकिन अब टेसू (पलास) के पेड़ों की अस्तित्व लगभग समाप्त होता जा रहा है। जिले में हालात ये है कि बेतवा नदी किनारे ही कुछ पेड़ बचे है। जिनका संरक्षण नहीं होने से यह खत्म होने की कगार पर पहुंच रहे है। अमित लखेरा ने परिचर्चा को आगे बड़ाते हुए बताया कि आधुनिकता के दौर में पारंपरिक रंगों की पहचान खो गई है। एक समय था जब फागुन आते ही ग्रामीण क्षेत्रों में लोग बाग-बगीचों तथा पगडंडियों के किनारे लगे टेसू के पेड़ों से फूल बीन कर उनसे रंग उतार कर होली की तैयारी करने लगते थे। जिन घरों में टेसू का रंग नहीं उतारा जाता था। वह बाजार से बसंती रंग खरीद कर होली खेलते थे। बुंदेलखंड के कुछ क्षेत्रों में चौत्र शुक्ल पष्टी को टिसुआ छठ के रूप में भी मनाते थे। उस दिन टेसू के वृक्ष तथा पुष्पों की पूजा करते थे। टेसू की आरोग्यदायी प्रकृति के कारण उसे जन सामान्य से जुड़ा हुआ था। गौरैया अभियान के संयोजक पुष्पेंद्र सिंह चौहान का कहना है कि पलाश के फूल ही नहीं इसके पत्ते, टहनी, फली तथा जड़ तक का बहुत ज्यादा आयुर्वेदिक तथा धार्मिक महत्व है। देश में प्रचुर मात्रा में होने के बावजूद इसका व्यवसायिक उपयोग नहीं हो पा रहा है। आयुर्वेद की माने तो होली के लिए रंग बनाने के अलावा इसके फूलों को पीस कर चेहरे में लगाने से चमक बढ़ती है। यही नहीं पलाश की फलियां कृमिनाशक का काम तो करती ही है इसके उपयोग से बुढ़ापा भी दूर रहता है। पलाश फूल के पानी से स्नान करने से लू नहीं लगती तथा गर्मी का अहसास नहीं होता। पलाश के पत्तों का उपयोग ग्रामीण दोना पत्तल बनाने के लिए करते हैं। पलाश के जड़ से रस्सी बनाकर धान की फसल को भारा बांधने के उपयोग में लाया जाता हैं। पलाश की फली कृमीनाशक है। टेसू के फूल को घिस कर चिकन पाक्स के रोगियों को लगाया जा सकता है। टेसू का फूल असाध्य चर्म रोगों में भी लाभप्रद होता है। हल्के गुनगुने पानी में डालकर सूजन वाली जगह धोने से सूजन समाप्त होती है। चर्मरोग के लिये टेसू के फूल को सुखाकर चूर्ण बना लें। इसे नीबू के रस में मिलाकर लगाने से हर प्रकार के चर्म रोग में लाभ होता है। परिचर्चा को समाप्त करते हुए एड राजेश पाठक ने बताया कि आज भी बुन्देलखण्ड के कई गांव हैं जहां के लोगों का जीवन-यापन ही पलाश के बने उत्पादों से चलता है। एक दौर था जब पलाश की सूक्ष्म और लद्यु कुटीर उद्योग में अहम हिस्सेदारी रही जो सुविधावादी इस युग में विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गयी है। हालांकि ग्रामीण इलाकों में पलाश आज भी पर्याप्त रूप से मिलता है। किसान और समाजसेवी उमाशंकर पाण्डेय बताते हैं कि यह खेत खलिहानों में स्वतरू तैयार होने वाला पौधा है जो धीरे-धीरे एक वृक्ष का रूप ले लेता है।

✍️अमित लखेरा

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