कल्प वृक्ष के बारे में यह अनूठी जानकारी जानकर चौंक जायेंगे आप

262
0
SHARE
ओरछा का बेओबाब ट्री (कल्प वृक्ष)

-रजनीश, सागर
” बेओबाब है कल्पवृक्ष ”
जिसे हम कल्पवृक्ष कहते हैं दरअसल बेओबाब(baobab tree) वृक्ष है जो मेडागास्कर , अफ्रीका, आस्ट्रेलिया में पाया जाने वाला पेड़ है। भारत सहित कुछ एशियाई देशों में भी कम संख्या में मिलता है। यह हजारों वर्ष जीवित रह सकने वाला वृक्ष है जिसे हिंदू मायथालाजी में जल्दी नष्ट नहीं होने और बिल्कुल सूख कर फिर हरा हो जाने के गुणों से युक्त मान कर कल्पवृक्ष कहा गया है। यह वृक्ष वर्ष के ज्यादातर महीनों में बिना पत्तों के इस तरह दिखता है जैसे वृक्ष ने उल्टे होकर आसमान की ओर जड़ें निकाल दी हों। अचानक इन जड़ों जैसे तने और शाखाओं से पत्ते ऊग आते हैं और पूरा वृक्ष हरे रंग के बेलवेट जैसे आवरण से ढके मध्यम आकार के फलों से भर जाता है। इन फलों को तोड़ने पर भूरे रंग का पाऊडर निकलता है और छोटे छोटे किडनी जैसे आकार के काले बीज निकलते हैं जो बेहद कड़े आवरण वाले रहते हैं। बीज ऐसे होते हैं जो वर्षों तक पानी में पड़े रहें ,मिट्टी में पड़े रहें पर अंकुरित नहीं होते। खासतौर पर भारतीय परिवेश में तो नहीं ही अंकुरित होते ,इसीलिए इनके अपने आप उगे हुए नये पौधे दिखाई नहीं देते। बेओबाब वृक्ष की कुल आठ उपप्रजातियां हैं और सभी में एक खासियत कम या अधिक मात्रा में होती है कि इनके विशालकाय तनों में सैकड़ों लीटर पानी स्टोर रहता है जो लगातार कई वर्षों का सूखा पड़ जाने पर भी वृक्ष को मरने नहीं देता।
पृथ्वी पर जहां-जहां बेओबाब वृक्ष पाया जाता है गौर कीजिए कि वे सभी स्थल लाखों साल की निरंतर प्रक्रिया में अफ्रीका की मुख्य भूमि से भौगोलिक परिवर्तन के दौरान अलग हुए हैं। यानि इनका मूल एक ही है। इस तरह कह सकते हैं कि यह पेड़ भी लाखों साल से अपने आदिम स्वरूप में ही कायम है। लगता है कि इस वृक्ष के बीजों से अंकुरण में हाथी जैसे कुछ विशाल जीव अपनी भूमिका निभाते हैं। अफ्रीका में इन ऊंचे वृक्षों तक सिर्फ हाथी की पहुंच होती है। हाथी इनके पौष्टिक फल खाते हैं। फलों के कठोर बीज हाथियों के पाचन तंत्र से गुजर कर साबुत ही बाहर निकलते हैं लेकिन तब तक इनका कड़ा खोल नर्म होकर लीद में ही अंकुरित होने योग्य हो जाता है। लगभग एक दशक पहले भोपाल की एक शोधछात्रा ने बेओबाब बीजों के अंकुरण पर शोध करके इन्हें अंकुरित करने में सफलता हासिल कर ली थी। उसका रिसर्च पेपर नेट पर उपलब्ध है। अब तो यू ट्यूब पर सैकड़ों वीडियो उपलब्ध हैं जिनमें बेओबाब को बीजों से उगाने की विधि प्रत्यक्ष दिखाई गई है। बीज के पिछले हिस्सों को सेंड पेपर या पत्थर पर लगातार रगड़ कर खोल को बिल्कुल पतला कर लिया जाता है, फिर इनको पानी में 48 घंटों के लिए छोड़ दिया जाता है। बीज अंकुरित होने लगता है तब धीरे से बाकी कवच को भी उतार कर मिट्टी में लगा दिया जाता है। यानि बीज हैं तो उनके अंकुरित होने का तरीका भी है।
इस वृक्ष के फलों के पौष्टिक गुणों पर भी शोध हो चुके हैं और अब इनसे बने उत्पादों का व्यवसायीकरण भी हो गया है। बेओबाब के फलों से निकलने वाला गूदा जो सूख कर पाउडर की तरह इकट्ठा किया जा सकता है वह अपने आप में संपूर्ण ऊर्जा वाला, सशक्त खाद्य है। इतनी पौष्टिकता से भरा कि इसे मुनगा की फलियों की तरह सुपर फूड माना गया है। यानि कुपोषण से लड़ने का ताकतवर हथियार। इस तरह से भी यह वृक्ष कल्पवृक्ष कहलाने की पात्रता रखता है।
सागर जिले की नई कलेक्ट्रेट बिल्डिंग में बेओबाब के दो पुराने वृक्ष लगे हैं जो सैकड़ों वर्ष पुराने माने गये हैं। देखने से लगता है इनमें से बड़ा वृक्ष दूसरे की तुलना में आधी उम्र का होगा। उल्लेखनीय है कि सागर भी गौंडवाना का हिस्सा रहा है जिसमें सन् 1850 के आसपास तक जंगली हाथियों की पर्याप्त उपस्थिति थी। खासतौर पर सागर का यह परिसर सन् 1900 के पहले कई दशकों तक कुख्यात विख्यात रईस रघुबर दुबे, उनके पुत्रों गयाप्रसाद और रामगुलाम दुबे परिवार का आवासीय बगीचा रहा है (चित्र में इसके एक दशक पहले के भग्नावशेष देखें) जिनके पास हमेशा कई पालतू हाथी रहे जो शनीचरी के हाथीखाना के अलावा इस परिसर में भी रहते थे। सागर के अलावा बेओबाब के दो वृक्ष खिमलासा में, एक शाहगढ़ इलाके में कहीं और दो विशाल वृक्ष ओरछा में भी हैं। ओरछा के वृक्ष की तस्वीर कुछ महीने पहले मैंने खुद ही अपने मोबाइल कैमरे से ली थी।
सागर में पीलीकोठी के सामने वाले नये कलेक्ट्रेट परिसर में लगभग बीस साल पहले तक मुख्य बेओबाब वृक्ष के नीचे एक फक्कड़ लेकिन दिव्यता से भरे करोड़ी बाबा रहा करते थे। कड़ोरी बाबा कहाँ से और कब आए यह पुष्ट रूप से पता नहीं चलता,लोग उन्हें लगभग चालीस साल पहले से वहां देख रहे थे। ओज से चमकता भव्य चेहरा और तेज से भरी आंखों वाले इन बाबा की सागर जिले के शिक्षा विभाग का वरिष्ठ स्टाफ देखभाल करता था। इन बाबा में आध्यात्मिक सिद्धियां थीं और दूर-दूर से उनके भक्त उनके पास आते रहते थे। इस समय तक कुछ ही परिवार ऐसे थे जो कल्पवृक्ष की पूजा करने आते थे। बाबा के दिवंगत होने के कुछ साल बाद सन् 2005 के आसपास दलपतपुर (बंडा) से एक पंडित जी जिनकी ससुराल परकोटा पर थी सागर आकर रहने लगे। तब तक सागर विश्वविद्यालय के वनस्पतिशास्त्र विभाग के खोजी वृत्ति के प्रोफेसर अजयशंकर मिश्रा ने इस वृक्ष को पुराणों में वर्णित कल्पवृक्ष बता कर अखबारों में इस पर खबरें छपवा दी थीं।
दलपतपुर के पंडित जी ने इसमें संभावना ढूंढ़ी और उन्होंने इनमें से एक वृक्ष पर लाल सिंदूर लगे पत्थरों के देवता विराज कर चबूतरा बनाना शुरु कर दिया। ज्यों-ज्यों चढ़ोत्तरी आती गई चबूतरा टाइल्स वाला चौड़ा होता गया और पास में ही पंडित जी की झोपड़ी तन गई। झोपड़ी एक दशक में टीवी पंखे वाला आवास बन गई जिसमें पंडित जी सपरिवार रहने लगे। सन् 2015 में रामगुलाम दुबे के सन् 1897 में बने देव जानकीरमण दुबे ट्रस्ट से सागर जिला नजूर विभाग ने एकतरफा केस जीत लिया और 8.16 एकड़ के इस बेशकीमती परिसर को नजूल की भूमि बता कर कब्जा कर लिया। जल्दी ही इस पर कलेक्ट्रेट की नई बिल्डिंग खड़ी हो गई। बिल्डिंग की डिजाइन ऐसी बनाई गई जिसमें परिसर के दोनों कल्पवृक्षों सहित सभी कीमती पुराने वृक्ष व एक अभिलेख युक्त एतिहासिक कुआं बचा कर खूबसूरत लेंडस्केप का हिस्सा बन गये। कल्पवृक्ष वाले पंडित जी बिल्डिंग निर्माण के दौरान हटने से नानुकुर कर रहे थे। प्रशासन ने उनकी झोपड़ी को अतिक्रमण मान कर हटा दिया। कल्पवृक्ष के नीचे रखे सिंदूर वाले पत्थरों को वहीं रखा रहने दिया। पंडित जी अब भव्य कलेक्ट्रेट के भीतर कल्पवृक्ष के नीचे पंद्रह वर्ष पूर्व रखे अपने देवताओं के आधार पर मंदिर बनवाने की जुगत में आने जाने लगे। तब जिला प्रशासन ने कल 6 अगस्त की रात सीमित कार्यवाही करते हुए कल्पवृक्ष चबूतरे के टाइल्स उखाड़ने और रखे गेरुआ पत्थरों को हटा कर अन्यत्र मंदिर में रखने की कार्यवाही की। इस पर रात में ही बवाल मच गया। अयोध्या जी में प्रभुश्री राम के मंदिरनिर्माण से धर्ममय हुए माहौल में प्रशासन की ऐसी दबी छुपी औचक कार्यवाही लोगों को रास न आई। बहुत से लोग, संगठन वहां जमा हो गये। कार्यवाही रोकी गई और घटना को इस हद तक तूल दिया गया कि संभव है वहां आगे एक मंदिर भी निर्मित हो जाए। पंडित जी इसी के लिए तो दलपतपुर से अपनी ससुराल सागर आए थे।
बहरहाल जो भी हो। मेरी चिंता उन दुर्लभ बेओबाब वृक्षों जिन्हें सभी कल्पवृक्ष कहते हैं, को लेकर है। कलेक्ट्रेट बिल्डिंग बनने के दौरान ज्यादातर भूमि में भवन, सड़क और पेवर ब्लाक लग चुके हैं। न जाने कब और किसने बिना उद्यानकी विशेषज्ञों से सलाह लिए कल्पवृक्षों के तने के मूल में सीमेंट कांक्रीट के गोल चबूतरे बना दिए। पंडित जी के टाइल्स ऊपर से तने को सीलपैक करते हुए लगे ही हैं। प्रशासन और पंडित जी के इन संयुक्त प्रयासों के बाद अब मजाल है कि बारिश की एक बूंद भी कल्पवृक्ष की जड़ों की ओर चली जाए। जाने कब और कितने वर्षों तक इन दोनों वृक्षों को अपने संचित पानी से जीवित रहना होगा। मेरा आग्रह है कि जो बनाना है बनाओ पर वहां से कांक्रीट का चबूतरा और टाइल्स हटाओ। वे सिंदूरी पत्थर वृक्ष के तने से सटा कर उसकी पवित्र माटी पर धर दो और खूब पूजा करो जितनी शक्ति भर संभव हो …पर इन दुर्लभ प्रकृति की अनमोल भेंट कल्पवृक्षों को कारागार से मुक्त कर हवा और पानी लेने दो। सागर कलेक्टर दीपक सिंह से और सागर के पर्यावरण प्रेमियों से एक निवेदन यह भी है कि इन दुर्लभ बेओबाब वृक्षों के फलों से निकलने वाले सूखे फलों को सुरक्षित करें। इनके बीज निकाल कर नर्सरियों को भेजें। बेओबाब बीजों को अंकुरित कर पौधे बनाने की वीडियो यूट्यूब से देख कर नये वृक्ष तैयार कराएं। यह वृक्ष जब इतना पवित्र है तो सभी लोग इसके पौधे खरीद कर अपने आंगनों बगीचों में लगाएंगे भी। यही सबसे सच्ची श्रद्धा, भक्ति, आस्था और धर्म होगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here